जब सिनेमा में राष्ट्रवाद के नाम पर एक दूसरे को मटियामेट करने की चीखें बिक रही हों; तब इम्तियाज़ अली एक बिल्कुल अलग जोखिम उठाते है. उनकी फ़िल्म विभाजन की त्रासदी तो दिखाती है, लेकिन उसे नफ़रत फैलाने के औज़ार में नहीं बदलती.